तुम पूछते हो कि मैं लिखता क्यों हूँ,
लिखता हूँ क्योंकि मैं बोलना नहीं चाहता,
सोचना चाहता हूँ, डूबना नहीं चाहता,
सर्द हवाएँ अंदर समेटे, गर्माहट को भूलना नहीं चाहता,
लिखता हूँ चूंकि आप मुझे पढ़ सको,
क्योंकि कोई यहाँ सुनना नहीं चाहता |
जड़ से भरा हूँ और जऱ्राह बन सकूँ इसलिये लिखता हूँ,
लिखता हूँ ताकि जज़्बातों के दरिया को सागर बनने से पहले रोक सकूँ,
लिखता हूँ क्योंकि जानकारियों के इस चक्रवात में अपने दिल को टटोल सकूँ,
लिखता हूँ ताकि बिना किसी के सुने दिल की बोल सकूँ |
लिखता हूँ क्योंकि शब्दों का दायरा सिमट रहा है,
कोई बाग़ में बैठी तितली, तो कोई टूटा तारा कुछ कह रहा है,
संदेशों और ख़तों की ख़ुशबू को कोई बेजान-सा व्हाट्सएप “चट” कर रहा है,
इन सबको भूल न जाने को, और सुनने- सुनाने को मैं लिखता हूँ !
लिखता हूँ अपने भीतर के डर से रूबरू होने को,
लिखता हूँ अपने अंदर के अज्ञेयवाद से परिचित होने को,
लिखता हूँ असंख्य, अनजाने किरदारों में खोने को,
लिखता हूँ आईने के सामने खड़े उस शख़्स से जवाब तलब करने को,
जो आज भी कल के हसीन ख़्वाब दिखाकर हक़ीक़त से रूबरू कराती है |
लिखता हूँ बुकोव्स्की के उस सवाल का जवाब देने को
जिसमें वो पूछते हैं, "तो तुम लेखक बनना चाहते हो?"
हाँ, मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं स्याही बन के फैलना चाहता हूँ
क्योंकि मैं छपना चाहता हूँ, मिटना नहीं चाहता
क्या अब भी तुम ये पूछोगे कि “मैं लिखता क्यों हूँ”? |
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