सूरज क्षितिज से दूर था,
चंद्रिमा रात को निकला,
चांद भी बेनूर था
किसी का भाई रहा सोया,
मिटा किसी का "सिंदूर" था,
सिंदूर नहीं मिटाया तुने,
छीना उस देवी का गहना,
दिखा नहीं तुझे ओ पापी,
उन नयनों से बहता झरना,
जो सिंदूर मिटाया तूने,
क्या तूने उसका रंग न देखा,
उस माथे से उतरा रंग,
बन तेरे रक्त का सैलाब चढ़ेगा,
अरे! बर्बरता के कृषक,
जन्नत छोर, जहन्नुम कहां मुकम्मल होगी?
इस सिंदूर की क्रोधाग्नि से,
जल तेरी जहां भी काली होगी,
उन चेहरों से छीनी जो तूने, खुशहाली की अनूप नूर!
जो उतरेगा बन तेरा लहू, कयामत नहीं, वो होगा 'सिंदूर' !
देखेगा! तू भी देखेगा,
जो रंग मिटाया साज से तूने,
था रंग नहीं, वो ज़लज़ला,
तेरे मुल्क की बर्बादी का,
"सिंदूर " बनेगा सिलसिला |
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