Tuesday, February 3, 2026

सिंदूर

अंधियारे की ओर बढ़ा,
सूरज क्षितिज से दूर था, 
चंद्रिमा रात को निकला,
चांद भी बेनूर था 
किसी का भाई रहा सोया,
मिटा किसी का "सिंदूर" था,

            Image generated with AI

सिंदूर नहीं मिटाया तुने, 
छीना उस देवी का गहना,
दिखा नहीं तुझे ओ पापी,
उन नयनों से बहता झरना, 
जो सिंदूर मिटाया तूने,
क्या तूने उसका रंग न देखा,
उस माथे से उतरा रंग, 
बन तेरे रक्त का सैलाब चढ़ेगा, 

अरे! बर्बरता के कृषक,
जन्नत छोर, जहन्नुम कहां मुकम्मल होगी?
इस सिंदूर की क्रोधाग्नि से,
जल तेरी जहां भी काली होगी,
उन चेहरों से छीनी जो तूने, खुशहाली की अनूप नूर!
जो उतरेगा बन तेरा लहू, कयामत नहीं, वो होगा 'सिंदूर' ! 

देखेगा! तू भी देखेगा,
जो रंग मिटाया साज से तूने,
था रंग नहीं, वो ज़लज़ला,
तेरे मुल्क की बर्बादी का, 
"सिंदूर " बनेगा सिलसिला |

                                        














छोरे हुए घर

कुछ जोड़े हुए घर, कुछ छोड़े हुए घर
मेहनत की मिट्टी से मोरे हुए घर,
किसी वक़्त मज़बूती से हमारा कहलाने वाले घर,
दरारों के चलते मेरा और तुम्हारा हो जाने वाले घर।
ख़ुशियों की दीवाली से रौशन हुए घर,
कुछ अपने हुए घर, कुछ पराए हुए घर,
सब निकल पड़े हैं इस दौर में
सपनों का घर सँवारने,
पीछे रह गए हैं—
कुछ छोड़े हुए घर,
कुछ जोड़े हुए घर।

Inking Voice !

The clock is ticking to turn another hour;
My eyes don't blink, my mind won't think —
No! not yet, for my words haven’t roared.
They wedge apart the gap that hid pretentious peace;
My voice trembles, my thoughts stumble, and “I” still juggle with a piece.

                                            Image generated with the help of GPT

I want my words to drain out with the ink inside me,
That keeps me afloat — buoyant, yet meek.
I have no fear to die, yet I dare to fear,
For my words aren’t meant to be crushed, to sound bleak.
The hounding howls of those shining yet whining eyes —
The shackles will break, for my words corrode my nights.

I will leave; may I die for the liberation of these words,
Yet these words may die with me — throat-cut by the oppressor’s sword.
My nights are as bright as days;
My heart cold, my mind restless — yet my ink still slays.

Let your words sail through this tide,
For the bank of liberation has raised its slogan — clear, loud, and wide.








अटल: शब्द और संकल्प

                                                Image sourced from google.


उस कवि के काव्य-वर्णन को, कैसे कलम उठाऊँ मैं?
पाठक हूँ, बस पाठ्यक्रम के, जाल में खो जाऊँ मैं?
ना सरल वह, ना अचल वह, बस कर्म-पथ का राही था,
निस्वार्थ भाव, निज राष्ट्र-सेवा, माटी का वह सिपाही था!
था नाज़ जिसे इस मिट्टी पर, विरक्त भाव से गूंजे जो स्वर,
उस ध्वनि चोट की डंके से गुर्राती उठती लहर,
"कल जाए प्राण सो अब जाए,
संविधान ना मुरझाए",
माथे शिकन, ना निशान ही था
वो नेता कम इंसान भी था।
​जब भरी सभा में शोर बढ़ा
उसने आगे हुंकार गढ़ा :-
"करो मुझ पर उपहास करो,
अपनी जुबान तुम साफ़ करो,
ये जो व्यंग्य चलाते हैं मुझ पर,
इनमें ना एक सच्चाई मगर,
चलो यही व्यंग्य मैं गढ़ता हूँ,
कवि के नेत्रों से पढ़ता हूँ,
हम आज गए, तुम कल जाओगे,
जनता को क्या मुँह दिखलाओगे?
सत्ता की जो ये लोभ चढ़ी ,
है यही विनाश की विकराल घड़ी ,
जब तख़्त उछाले जाएंगे,
हम देख उसे रुक जाएंगे,
काल का पहिया फिर घूमेगा,
ये हिन्द अटल रह नभ चुमेगा!"
​मातृभूमि की सेवा से जिसने अपना स्वाभिमान गढ़ा,
विकट समय से रंजिश कर जब उसने अपना नाम कहा,
अटल गगन सा, अटल पवन सा, बस 'अटल' नाम दोहराऊँ मैं,
उस भूमि-पुत्र के गौरव में, अब और भला क्या गाऊँ मैं!


3:00 am






ये जुनूँ किसका, ये पागलपन किस लिए,
ये दुआएँ, ये इबादत किस लिए।

मुसलसल अज़ियतों में भी मुस्कुराता रहा,
करें इश्क़ में ख़ुद को क़ुर्बान किस लिए।

ता-उम्र ख़ुद-परस्ती से क़ुरबत रहा हमारा,
आज क़ाफ़िला लुटा बैठे, हैरानी किस लिए।

हमें भी नाज़ था उनके अंदाज़-ओ-करम पर,
दिल का देना क्या था, मेहरबानी किस लिए।

इसे ख़्वाब कहूँ या तेरी सोची हुई तदबीर,
ये ज़िंदगानी यूँ जली, शमशान किस लिए।

ऐ रितेश , ये जुनूँ, ये आग-ए-दिल किस लिए,
जो ख़ुद को ही जला दे, वो मोहब्बत किस लिए।

हिज्र का सबब

मेरा ग़म मेरा ग़म था, कोई तराना न था,
तेरे हिज्र का सबब क्या कहूँ, कोई फ़साना न था।

उन ग़ज़ाल-सी आँखों से निकले तो कैसे निकले कोई,
दिमाग़ी साज़िशों के आगे दिल का कोई बहाना न था।

बज़्म-ओ-बाज़ार के शोर में भी बेख़बर रहे हम,
हमें ख़ुद-फ़रोख़्ती का सबक़ सब से बताना न था।

तू था तो मुसलसल बनती गई तदबीर मेरी,
मेरे तख़य्युल में तेरा आना सिर्फ़ आना न था।

तेरे एहतराम में किया करते थे जो सजदा,
ठोकर खाकर यूँ गिरे, सर को सिरहाना न था।

शाख़ से लगे हुए इठलाते थे हवाओं पर,
चराग़ों को अपनी रौशनी पे इतना भी इतराना न था।

हम रितेश रात की ख़लवत में लिखा करते हैं,
दिन को मुमकिन ये क़लम उठाना भी न था।

सिंदूर

अंधियारे की ओर बढ़ा, सूरज क्षितिज से दूर था,  चंद्रिमा रात को निकला, चांद भी बेनूर था  किसी का भाई रहा सोया, मिटा किसी का "सिंदूर"...