Tuesday, February 3, 2026

अटल: शब्द और संकल्प

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उस कवि के काव्य-वर्णन को, कैसे कलम उठाऊँ मैं?
पाठक हूँ, बस पाठ्यक्रम के, जाल में खो जाऊँ मैं?
ना सरल वह, ना अचल वह, बस कर्म-पथ का राही था,
निस्वार्थ भाव, निज राष्ट्र-सेवा, माटी का वह सिपाही था!
था नाज़ जिसे इस मिट्टी पर, विरक्त भाव से गूंजे जो स्वर,
उस ध्वनि चोट की डंके से गुर्राती उठती लहर,
"कल जाए प्राण सो अब जाए,
संविधान ना मुरझाए",
माथे शिकन, ना निशान ही था
वो नेता कम इंसान भी था।
​जब भरी सभा में शोर बढ़ा
उसने आगे हुंकार गढ़ा :-
"करो मुझ पर उपहास करो,
अपनी जुबान तुम साफ़ करो,
ये जो व्यंग्य चलाते हैं मुझ पर,
इनमें ना एक सच्चाई मगर,
चलो यही व्यंग्य मैं गढ़ता हूँ,
कवि के नेत्रों से पढ़ता हूँ,
हम आज गए, तुम कल जाओगे,
जनता को क्या मुँह दिखलाओगे?
सत्ता की जो ये लोभ चढ़ी ,
है यही विनाश की विकराल घड़ी ,
जब तख़्त उछाले जाएंगे,
हम देख उसे रुक जाएंगे,
काल का पहिया फिर घूमेगा,
ये हिन्द अटल रह नभ चुमेगा!"
​मातृभूमि की सेवा से जिसने अपना स्वाभिमान गढ़ा,
विकट समय से रंजिश कर जब उसने अपना नाम कहा,
अटल गगन सा, अटल पवन सा, बस 'अटल' नाम दोहराऊँ मैं,
उस भूमि-पुत्र के गौरव में, अब और भला क्या गाऊँ मैं!


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सिंदूर

अंधियारे की ओर बढ़ा, सूरज क्षितिज से दूर था,  चंद्रिमा रात को निकला, चांद भी बेनूर था  किसी का भाई रहा सोया, मिटा किसी का "सिंदूर"...